दोस्तों
आज मैं कोई हल्की-फुल्की बात नहीं करने वाला।
आज बात है हमारी सेहत की…
हमारे भरोसे की…
और उस बाज़ार की जो “हेल्थ”, “फिटनेस”, “वज़न कम”, “डिटॉक्स”, “हर्बल” और “नेचुरल”
जैसे खूबसूरत शब्दों के पीछे करोड़ों का कला कारोबार चला रहा है।
एक Author (Md Karim Didar) होने के नाते मैंने हमेशा कोशिश की है कि जो बातें आम लोगों की सेहत से जुड़ी हों,
उन्हें बिना डर और बिना दबाव के लिखा जाए।
इसीलिए आज ये लंबी तहरीर लिख रहा हूँ।
सोशल मीडिया खोलिए…
हर दूसरी वीडियो में कोई ना कोई आपको यही कहता मिलेगा कि “
बस ये पाउडर पीजिए”,
“ये शेक लीजिए”,
“ये सप्लीमेंट खाइए”,
“15 दिन में पेट अंदर”,
“30 दिन में फैट खत्म”,
“लिवर साफ”,
“बॉडी डिटॉक्स”।
लेकिन सवाल ये है…
क्या सच में इंसान की सेहत इतनी सस्ती हो गई है कि एक डिब्बा खरीद कर सब ठीक हो जाएगा?
आजकल खास तौर पर कुछ MLM कंपनियों के प्रोडक्ट्स को लेकर बहुत बहस चल रही है।
खासकर Herbalife जैसे ब्रांड को लेकर इंटरनेट पर हजारों वीडियो, पोस्ट, रिसर्च पेपर और डॉक्टरों की राय सामने आ चुकी है।
कोई इसे हेल्थ प्रोडक्ट कहता है,
कोई बिजनेस मॉडल…
और कोई इसे सेहत के लिए खतरा बताता है।
मैं यहाँ किसी कंपनी से दुश्मनी निकालने नहीं आया हूँ।
न ही मेरा मकसद किसी की रोज़ी-रोटी पर हमला करना है।
लेकिन अगर किसी चीज़ पर मेडिकल स्टडीज़, डॉक्टरों की चेतावनी और मरीजों के केस सामने आ रहे हों, तो उस पर बात करना ज़रूरी हो जाता है।
क्योंकि सेहत मज़ाक नहीं है जनाब।
सबसे पहले एक बात समझ लीजिए
“हर्बल” शब्द का मतलब हमेशा “सुरक्षित” नहीं होता।
भारत में लोग “हर्बल” सुनते ही आँख बंद करके भरोसा कर लेते हैं।
उन्हें लगता है कि अगर चीज़ पौधों से बनी है तो नुकसान नहीं करेगी।
लेकिन दुनिया की सबसे खतरनाक जहर में पौधों से ही आते हैं।
यानी “नेचुरल” होना, “सेफ” होने की गारंटी नहीं है।
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कई डॉक्टरों और रिसर्च पेपर्स में कुछ सप्लीमेंट्स और वेट लॉस प्रोडक्ट्स को लेकर लीवर इंजरी यानी जिगर को नुकसान पहुँचाने की बातें सामने आईं।
NIH यानी National Library of Medicine में भी कुछ केस रिपोर्ट्स पब्लिश हुईं, जिनमें कुछ लोगों को सप्लीमेंट्स लेने के बाद गंभीर लीवर प्रॉब्लम हुई।
कुछ रिपोर्ट्स में Herbalife का नाम भी आया।
अब यहाँ समझने वाली बात ये है कि “association” और “proof” दोनों अलग चीज़ें होती हैं।
अगर किसी इंसान ने कोई प्रोडक्ट लिया और उसके बाद उसे बीमारी हुई, तो इसका मतलब ये नहीं कि 100% वही प्रोडक्ट वजह है।
लेकिन जब अलग-अलग देशों से ऐसे कई केस आने लगें, तब डॉक्टर और रिसर्चर उस चीज़ को गंभीरता से देखने लगते हैं।
इसीलिए मेडिकल जर्नल्स में कई केस रिपोर्ट्स लिखी गईं।
कुछ स्टडीज़ में ये कहा गया कि कुछ लोगों को सप्लीमेंट्स लेने के बाद acute hepatitis, liver toxicity और liver failure जैसी दिक्कतें हुईं। कुछ मरीजों को अस्पताल तक जाना पड़ा। कुछ मामलों में ट्रांसप्लांट की नौबत तक बताई गई।
अब कोई पूछेगा
क्या सिर्फ Herbalife ही खराब है?
नहीं।
सच्चाई ये है कि पूरी सप्लीमेंट इंडस्ट्री में बहुत बड़ा खेल चलता है। सिर्फ एक कंपनी नहीं… दुनिया भर में ऐसे हजारों सप्लीमेंट्स बिक रहे हैं जिन पर पर्याप्त रिसर्च नहीं होती।
कुछ में बहुत ज्यादा शुगर होती है।
कुछ में heavy metals पाए गए।
कुछ में undisclosed compounds यानी ऐसे तत्व पाए गए जिनका लेबल पर ठीक से जिक्र नहीं था।
कुछ में contamination की रिपोर्ट भी सामने आई।
और सबसे खतरनाक चीज़ क्या है?
लोग डॉक्टर की सलाह छोड़कर “कोच”, “मेंटॉर”, “वेलनेस एक्सपर्ट”, “फिटनेस गाइड” और “नेटवर्क लीडर” की बातों पर भरोसा करने लगते हैं।
यही सबसे बड़ा खतरा है।
क्योंकि शरीर कोई मशीन नहीं कि हर इंसान पर एक जैसा फॉर्मूला काम करेगा।
किसी का लिवर कमजोर हो सकता है।
किसी को पहले से fatty liver हो सकता है।
किसी को diabetes हो सकती है।
किसी को kidney की बीमारी हो सकती है।
किसी को allergy हो सकती है।
लेकिन MLM वाले क्या बोलते हैं?
“भाई सब नैचुरल है।”
“कोई साइड इफेक्ट नहीं।”
“डॉक्टर भी यही लेते हैं।”
“100% safe।”
“मैंने लिया है मुझे फायदा हुआ।”
जनाब…
किसी एक इंसान को फायदा हो जाने से कोई चीज़ वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित साबित नहीं हो जाती।
सिगरेट पीने वाले भी कई लोग 90 साल तक जी लेते हैं…
तो क्या सिगरेट हेल्दी हो गई?
सोचिए।
मैं ऑथर Md Karim Didar होने के नाते मैं सिर्फ वायरल वीडियो देखकर बात नहीं कर रहा, बल्कि अलग-अलग रिपोर्ट्स, रिसर्च पेपर्स और डॉक्टरों की राय पढ़ने के बाद ये बातें आपके सामने रख रहा हूँ।
अब बात करते हैं उस बिजनेस मॉडल की जो इन कंपनियों को और ज्यादा विवादित बनाता है।
MLM यानी Multi Level Marketing।
इसमें असली कमाई सिर्फ प्रोडक्ट बेचने से नहीं,
बल्कि नए लोग जोड़ने से होती है।
हर इंसान अपने नीचे नए लोग जोड़ता है…
फिर वो आगे लोगों को जोड़ते हैं…
और ये चेन चलती रहती है।
समस्या तब शुरू होती है जब हेल्थ साइंस की जगह “मोटिवेशन” और “इमोशन” बेचने लगते हैं।
आपने देखा होगा
स्टेज पर लोग रो रहे हैं…
“मैं पहले गरीब था…”
“मैं मोटा था…”
“मैं बीमार था…”
“इस प्रोडक्ट ने जिंदगी बदल दी…”
लेकिन वहाँ मेडिकल डेटा नहीं होता।
Controlled trial नहीं होता।
Scientific transparency नहीं होती।
बस emotional marketing होती है।
और सबसे दुख की बात ये है कि बेरोजगार नौजवान, घर की महिलाएँ, छोटे शहरों के लोग,
और जल्दी पैसा कमाने का सपना देखने वाले लोग इसमें फँस जाते हैं।
उन्हें कहा जाता है
“बस 10 लोग जोड़ो।”
“बस 5 किलो कम करो।”
“बस रोज़ पोस्ट डालो।”
“लोग खुद जुड़ेंगे।”
लेकिन सच्चाई क्या है?
ज्यादातर लोग पैसे नहीं कमा पाते।
उल्टा खुद प्रोडक्ट खरीद-खरीद कर नुकसान में चले जाते हैं।
कई बार लोग अपनी बीमारी तक छिपा लेते हैं ताकि बिजनेस चलता रहे।
अब जरा उस psychology को समझिए जो इस्तेमाल की जाती है।
पहले इंसान को उसकी कमजोरी याद दिलाई जाती है।
अगर कोई मोटा है
उसे शर्म महसूस कराई जाती है।
अगर कोई दुबला है
उसे कमजोर कहा जाता है।
अगर कोई गरीब है
उसे “9 से 5 वाली गुलामी” से डराया जाता है।
फिर solution दिया जाता है
“ये प्रोडक्ट लो।”
“ये बिजनेस जॉइन करो।”
“तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी।”
यानी पहले insecurity पैदा करो…
फिर उसी insecurity का इलाज बेचो।
अब सवाल उठता है
क्या सारे सप्लीमेंट्स खराब होते हैं?
नहीं।
कुछ सप्लीमेंट्स सच में मेडिकल जरूरत के लिए इस्तेमाल होते हैं। जैसे Vitamin D deficiency, B12 deficiency, protein requirement, sports nutrition वगैरह।
लेकिन फर्क ये है कि असली डॉक्टर टेस्ट देखकर सलाह देते हैं।
वो हर आदमी को एक जैसा पाउडर नहीं पकड़ा देते।
आजकल सबसे खतरनाक ट्रेंड है “self diagnosis”।
यूट्यूब वीडियो देखकर लोग खुद डॉक्टर बन जाते हैं।
Fatty liver?
Shake पी लो।
Weight loss?
Tea पी लो।
Thyroid?
Detox कर लो।
Kidney issue?
Herbal capsule खा लो।
अरे भाई… इंसानी शरीर Instagram reel नहीं है।
कई बार लोग proper खाना छोड़कर सिर्फ meal replacement shake पर जीने लगते हैं। इससे body में nutrition imbalance हो सकता है। किसी में weakness, किसी में acidity, किसी में hormonal issue, किसी में liver stress।
और हाँ, high protein हर इंसान के लिए सही नहीं होता।
अगर किसी की kidney पहले से कमजोर है तो ज्यादा protein नुकसान भी कर सकता है।
लेकिन सोशल मीडिया पर कौन ये सब समझाता है?
वहाँ तो सिर्फ “before-after” फोटो दिखती है।
वैसे भी आजकल फोटो और reality में जमीन-आसमान का फर्क होता है।
Lighting बदलो, angle बदलो, filter लगाओ… इंसान पहचान में नहीं आता।
अब आखिरी बात बहुत ध्यान से पढ़िए।
अगर आपको सच में weight loss करना है…
तो पहले test कराइए।
Liver function test।
Thyroid।
Sugar।
Vitamin levels।
फिर qualified doctor या certified dietician से सलाह लीजिए।
कोई भी supplement शुरू करने से पहले उसके ingredients पढ़िए।
Side effects पढ़िए।
Research देखिए।
Blind faith मत रखिए।
और सबसे जरूरी
अगर कोई इंसान आपको ये कहे कि “ये product हर बीमारी ठीक कर देगा”… तो समझ जाइए खतरे की घंटी बज चुकी है।
दुनिया में कोई magic powder नहीं होता।
Health मेहनत मांगती है।
सब्र मांगती है।
Discipline मांगती है।
अगर आपको ये पोस्ट जरूरी लगी हो, तो इसे सिर्फ share मत कीजिए…
पहले खुद पढ़िए… समझिए… फिर अपने घर वालों को भी समझाइए।
पत्रकार Md Karim Didar
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