रमज़ान के महीने में डर, बच्चा चोर का अफ़वाह और इंसानियत का इम्तिहान
(एक संजीदा अपील – कटिहार के गांवों वालों से)
रमज़ान सब्र है, रहमत है, गरीबों का ख्याल है, मज़लूम के साथ खड़े होने का नाम है।
लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि आज इसी मुक़द्दस महीने में, कटिहार के गांव-इलाकों में डर और अफ़वाहों का ऐसा माहौल बना दिया गया है, जिसमें इंसान इंसान से डरने लगा है।
आज हालात ये हैं कि
अगर कोई अजनबी दिखाई दे जाए,
अगर कोई गरीब आदमी सड़क किनारे बैठा दिख जाए,
अगर कोई लाचार, दिमाग़ी तौर पर बीमार इंसान इधर-उधर भटकता नज़र आए,
तो फ़ौरन उसके ऊपर “बच्चा चोर” होने का शक डाल दिया जाता है।
सोचने वाली बात ये है कि
क्या सिर्फ़ शक के आधार पर किसी को दोषी ठहरा देना इंसाफ़ है?
क्या इस्लाम, इंसानियत, संविधान – कहीं भी ये इजाज़त देता है?
एक सच और सौ झूठ
सच कड़वा होता है, लेकिन कहना ज़रूरी है।
अगर मान भी लिया जाए कि कहीं एक मामला सही निकल आता है,
तो उसके सामने सौ मामले झूठे, अफ़वाहों पर आधारित और शक की बुनियाद पर खड़े होते हैं।
लेकिन गांव के लोगों का हाल ये है कि
कोई व्हाट्सएप पर मैसेज डाल दे,
कोई चौराहे पर खड़ा होकर चिल्ला दे,
कोई कह दे – “फलां जगह बच्चा चोर पकड़ा गया है”
और बस…
बिना सोचे-समझे भीड़ इकट्ठा हो जाती है।
न कोई पूछताछ,
न कोई सबूत,
न पुलिस को सूचना,
सीधे फैसला और सज़ा।
क्या यही इंसाफ़ है?
इस माहौल में सबसे ज़्यादा परेशान हैं –
फकीर
लाचार गरीब
दिमाग़ी तौर पर अस्वस्थ लोग
असली भिखारी
घर से बिछड़े बेसहारा इंसान
जो लोग रोज़ रमज़ान में दर-दर जाकर रोटी मांगते थे,
जो लोग इफ्तार के वक़्त किसी दरवाज़े पर दस्तक देते थे,
आज वही लोग डर के साये में जी रहे हैं।
उन्हें डर है कि
कहीं कोई उन्हें बच्चा चोर न समझ ले,
कहीं भीड़ उन्हें घेर न ले,
कहीं उनकी जान न चली जाए।
सोचिए…
जिस रमज़ान में गरीबों को सबसे ज़्यादा सहारा मिलना चाहिए,
उसी रमज़ान में वे सबसे ज़्यादा डरे हुए हैं।
गांवों का सबसे बड़ा रोग – अंधविश्वास
ये कोई नई बात नहीं है।
कुछ साल पहले आपको याद होगा –
एक अफ़वाह उड़ी थी कि कोई “बाल काटने वाला” घूम रहा है,
जो औरतों के बाल काट देता है।
क्या हुआ था?
हर परछाईं में वही दिखने लगा
हर आवाज़ डर बन गई
बेगुनाह लोगों की पिटाई हुई
बाद में क्या निकला?
👉 सब अफ़वाह। एक भी पुख़्ता मामला नहीं।
लेकिन नुकसान हो चुका था।
आज वही कहानी फिर दोहराई जा रही है –
फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि
अब नाम बदल गया है – “बच्चा चोर”।
भूत-प्रेत और डर का कारोबार
गांवों में आज भी हाल ये है कि
अगर कोई कह दे कि फलां पेड़ पर भूत है,
फलां खेत में साया है,
फलां आदमी ऊपरी साये में है –
तो लोग बिना सवाल किए मान लेते हैं।
दिमाग़ बंद,
सोच खत्म,
तर्क गायब।
और इसी डर का फायदा उठाते हैं –
झूठ फैलाने वाले
भीड़ भड़काने वाले
अपनी नाकामी छुपाने वाले
दिमाग़ी तौर पर बीमार लोग – सबसे आसान शिकार
सबसे ज़्यादा दर्दनाक सच यह है कि
जो लोग मानसिक रूप से बीमार हैं,
जो सही-गलत का फर्क नहीं समझ पाते,
जो कभी हँसते हैं, कभी चिल्लाते हैं,
कभी इधर जाते हैं, कभी उधर –
वही लोग सबसे पहले शक के घेरे में आते हैं।
उनकी हालत पर तरस खाने की जगह,
उन पर शक किया जाता है,
उन्हें पीटा जाता है,
उनसे कबूलनामा करवाने की कोशिश की जाती है।
क्या ये इंसानियत है?
इस्लाम क्या सिखाता है?
इस्लाम कहता है –
बिना सबूत किसी पर इल्ज़ाम मत लगाओ
एक बेगुनाह का खून पूरी इंसानियत का खून है
शक से बचो, क्योंकि शक गुनाह है
कमजोर पर रहम करो
और हम रमज़ान में क्या कर रहे हैं?
डर फैला रहे हैं,
बेवजह शक कर रहे हैं,
और मज़लूम को और मज़लूम बना रहे हैं
कानून क्या कहता है?
याद रखिए –
किसी को पकड़ना पुलिस का काम है
जांच करना पुलिस का काम है
सज़ा देना अदालत का काम है
भीड़ का नहीं।
जो भीड़ बनकर किसी को मारता है,
वह खुद अपराधी बन जाता है।
आज आप किसी को पीट रहे हैं,
कल कोई आपको भी शक के आधार पर पीट सकता है।
सोचिए… अगर वो आपका अपना होता?
ज़रा एक पल के लिए सोचिए
अगर वो भिखारी आपका बाप होता?
अगर वो दिमाग़ी तौर पर बीमार आदमी आपका भाई होता?
अगर वो बेसहारा औरत आपकी मां होती?
क्या तब भी आप यही करते?
अब क्या करना ज़रूरी है?
1. अफ़वाह पर भरोसा न करें
2. व्हाट्सएप मैसेज को सच न मानें
3. किसी को शक हो तो पुलिस को सूचना दें
4. खुद कानून हाथ में न लें
5. गरीब, फकीर और लाचार की हिफ़ाज़त करें
6. बच्चों को भी समझाएं कि डरने की जरूरत नहीं
आख़िरी अपील
कटिहार के गांवों के भाइयों और बहनों,
डर से बाहर आइए।
सोच को ज़िंदा रखिए।
अफ़वाहों के गुलाम मत बनिए।
और इंसान को इंसान समझिए।
~ लेखक Md Karim Didar

