Katihar Barsoi में बढ़ता नशा और चोरी का धंधा: टूटता समाज, डरा हुआ आम आदमी | एक विस्तृत डॉक्यूमेंट्री
कटिहार–बारसोई के गाँवों में बढ़ता नशा कैसे चोरी, डर और सामाजिक टूटन की वजह बन रहा है, पढ़िए एक ज़मीनी डॉक्यूमेंट्री रिपोर्ट।
Katihar Barsoi में बढ़ता नशा और चोरी का धंधा: टूटता समाज, डरा हुआ आम आदमी | एक विस्तृत डॉक्यूमेंट्री
कटिहार–बारसोई: पहचान, सामाजिक ढाँचा और नैतिक पतन की शुरुआत भूमिका: एक इलाक़ा, कई सवाल कटिहार–बारसोई का इलाक़ा कभी मेहनतकश लोगों, और आपसी भरोसे के लिए जाना जाता था। घरों के दरवाज़े आधे खुले रहते थे, और रात का सन्नाटा डर नहीं, सुकून देता था। मगर वक़्त के साथ यह सुकून दरकता गया। आज के समय रातें डर से भरी होती हैं। चोरी की ख़बरें अब अपवाद नहीं रहीं साइकिल, मोटरसाइकिल, रसोई के बर्तन, यहां तक कि पशुओं के चारे के गमले तक उठा लिए जाते हैं। सवाल यह नहीं कि चोरी क्यों बढ़ी; सवाल यह है कि समाज यहाँ तक पहुँचा कैसे। यह रिपोर्ट किसी एक घटना पर नहीं है, यह उस प्रक्रिया को समझने की कोशिश है, जिसमें छोटे-छोटे सामाजिक समझौते टूटते गए, और नशे की लत ने धीरे, मगर लगातार, जीवन की धुरी को अपने क़ब्ज़े में ले लिया। यह Md Karim Didar की लेख किसी पर आरोप नहीं लगता, बल्कि जवाब की तलाश में है। 1. अर्थव्यवस्था, अवसरों की तंगी कटिहार–बारसोई का सामाजिक ढाँचा कृषि, दिहाड़ी, छोटे व्यापार और सीमित औद्योगिक गतिविधियों पर टिका है। खेती में मानसून के कारण नुकसान, मज़दूरी में घर चलाना और बाज़ार तक सीमित पहुँच, इन सबने आय को अस्थिर…