झिकरा मेला(Jhikra Mela) बारसोई की मिट्टी से जुड़ा सदियों पुराना लोक उत्सव, जहाँ आस्था, संस्कृति और गंगा-जमुनी की तहजीब झलकता है।

बरसोई, कटिहार का झिकरा मेला एक पुराना लोक उत्सव है, जहाँ आस्था, संस्कृति, झूले, खाना और आम लोगों की ज़िंदगी एक साथ दिखती है।
झिकरा मेला(Jhikra Mela) बारसोई की मिट्टी से जुड़ा सदियों पुराना लोक उत्सव, जहाँ आस्था, संस्कृति और गंगा-जमुनी की तहजीब झलकता है।
झिकरा मेला - बारसोई, कटिहार मेले का माहौल और समय बारसोई (Barsoi) बिहार के कटिहार जिले में स्थित एक छोटा सा कस्बा शिकारपुर है। यहाँ के लोग मुख्यतः हिन्दी बोलते हैं, साथ ही अंगिका, मैथिली, बंगाली और सूरजापुरी जैसी स्थानीय भाषाएँ भी सुनने को मिलती हैं। बारसोई के आस पास के पास ही महानंदा नदी बहती है, जिसे गंगा नदी की सहायक माना जाता है। इसी नदी के किनारे झिकरा मेला लगता है, तो पूरे इलाके का रंग ही बदल जाता है। सुबह का नजारा शांतिपूर्ण होता है हल्की धूप और ठंडी हवा साथ-साथ चलती है। ठंडी सुबह और उमड़ती भीड़ः जनवरी के महीने में, खासकर मकर संक्रान्ति के समय, गंगा के तट पर मेले की तैयारी शुरू हो जाती है। सुबह होते ही भक्तगण नदी के घाट पर स्नान करने पहुँचने लगते हैं। लोग ठण्डी में खेत के रास्ते लपेटे-बिछे पुराने कोहरे में पैदल, साइकिल या मोटर पर आते हैं, हाथ में तौलिए लिए और बदन पर हलके कपड़े पहने। थरथराती ठण्ड को चाप और तिल के लड्डू खाकर ठंड भुला दिया जाता है। रंगीले झूले और दुकानें : घाट के ठीक पास पर रंग-बिरंगे झूले, झूलेदार नार्वे और रोशनी से सजा मंदिर। चारों तरफ रोशनी के दीये, बिजली की रंग…