जलकी मजार शरीफ़: कटिहार के पवित्र सूफी स्थल Jalki Mazar Sharif की कहानी और सूफी परंपरा
कटिहार के आजमनगर (बरसोई) क्षेत्र में स्थित जलकी मजार शरीफ़ की नींव 12वीं सदी में रखी गई थी। स्थानीय तथ्यों के अनुसार सन 1136 ई॰ में तुर्की से पहुंचे स
Media Desk
जलकी मजार शरीफ़: कटिहार के पवित्र सूफी स्थल Jalki Mazar Sharif की कहानी और सूफी परंपरा
इतिहास और स्थापना कटिहार के आजमनगर (बरसोई) क्षेत्र में स्थित जलकी मजार शरीफ़ की नींव 12वीं सदी में रखी गई थी। स्थानीय तथ्यों के अनुसार सन 1136 ई॰ में तुर्की से पहुंचे सूफी संत सैयद शाह हुसैन तेग बरहाना जलालुद्दीन रहमातुल्लाह और उनके साथ सात शिष्य यहां आए थे। शुफी के आगमन के ठीक बाद ही मजार की स्थापना हुई, जिसे बाद में “लंगोट बंद पीर मजार” के नाम से भी जाना गया। यह दरगाह बंगाल के पांडवा, मनिहारी और सिलटर जैसे प्रसिद्ध पीर-मज़ारों के समकालीन माना जाता है। धार्मिक महत्त्व और सद्भाव जलकी मजार शरीफ़ सदियों से आस-पड़ोस के लाखों लोगों के विश्वास और मनोकामना का केंद्र रहा है। कहा जाता है कि यहां मांगी गई कोई भी दुआ खाली नहीं जाती। इसी आस्था के चलते प्रतिदिन, विशेषकर शुक्रवार को, दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां माथा टेकने आते हैं। इस पवित्र दरगाह पर हिंदू-मुस्लिम समेत विभिन्न संप्रदाय के लोग मिल-जुलकर आते हैं और एक दूसरे के साथ भाईचारे का संदेश पाते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस मजार पर ‘मजहबों की दीवार गिरने’ जैसी भावना हो जाती है, क्योंकि सभी यहां एक समान श्रद्धा के साथ …